केवल क्यों यीशु .
भारत देश में बहुत तेजी से यीशु मसीह के अनुयाई बढ़ रहे हैं लेकिन इसके साथ मसीही घटनाएं मसीही सताव भी बहुत ज्यादा बढ़ रहा है आए दिन चर्चो पर हंगामा करना पास्टर को मारना, गलत मामलों में उनको जेल डालना आम बात हो गई है लोगों का मानना है की यीशु मसीह विदेशी है और यीशु मसीह के लोग पैसा देकर धर्म परिवर्तन करते हैं क्या ऐसा सच है कुछ लोगों का मानना है की मसीही समाज के लोग हमारे भारत के देवी देवता को नहीं पूजते हैं और नहीं उनकी प्रतिमा को अपने घर में रखते हैं तो क्या इसी कारण से मसीही सताव बढ़ा है। हम सब जानते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां पर बहुत से धर्म के लोग रहते हैं जो हिंदू देवी देवता की पूजा नहीं करते हैं जैसे बुद्धिस्ट, कबीरपंथी, धन निरंकार, सिख, मुस्लिम,पारसी, ऐसे बहुत से पंथ है जो देवी देवता की पूजा नहीं करते हैं लेकिन लोग ईसाइयों से ही नफरत क्यों करते हैं, हम सब जानते हैं कि आज से हजारों साल पहले भारत देश में वर्ण व्यवस्था थी जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र जिसमें हिंदू जैसे शब्द का कोई भी विचारधारा (धर्म) नहीं था। और ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वैश्य को शिक्षा लेना और देने का अधिकार था लेकिन शूद्र को शिक्षा लेने और देने का अधिकार नहीं था लेकिन जब भारत को कई लोगों ने गुलाम बनाया जैसे आर्य , मुस्लिम शासक, पुर्तगाली और अंग्रेज और अंग्रेज के शासन शुरू होने तक भारत देश में शूद्र को पढ़ने का अधिकार नहीं था और शूद्र हिंदू भी नहीं थे। जब भारत में अंग्रेज आने लगे तब उसी समय एक बहुत महान मसीही(ईसाई) मिशनरी विलियम कैरी 1793 में भारत आए उसके 2 साल बाद 1795 में भारत देश में इन्ही शूद्रों को धन रखने का अधिकार मिला विलियम कैरी के आने से पहले भारत में शूद्र धन का संचय नहीं कर सकते थे लेकिन जब उनको अधिकार मिला तो भारत में ब्राह्मण समाज के लोग बहुत विरोध किए लेकिन कुछ नहीं हुआ जैसे आज दलित आरक्षण और sc, st एक्ट विरोध ईसाई नही बल्कि हिंदू करते हैं। उसके कुछ दिन बाद 1804 में कन्या हत्या पर रोक लगाई और 1813 में ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर सभी जातियों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार दिया और इसके बाद विलियम कैरी ने कोलकाता में 1818 में भारत का पहला स्कूल खोला जिसमें दलितों को पढ़ने का अधिकार मिला यह देखकर ब्राह्मणों को जिसे आज हम हिंदू कहते हैं बहुत बुरा लगा और उन्होंने बहुत विरोध किया लेकिन कुछ नहीं हुआ। 1820 में विलियम कैरी ने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अपने उत्साह के समर्थन के रूप में कोलकाता के अलीपुर में एग्री होर्टिकल्चर सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। 1830 में नरबलि प्रथा पर
रोक ( देवी -देवता को प्रसन्न
करने के लिए ब्राह्मण शुद्रों ,
स्त्री व् पुरुष दोनों को मन्दिर
में सिर पटक पटक कर
चढ़ा देता था.) 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया. यही नहीं महात्मा ज्योतिबा राव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भी ईसाइयों के नाइट स्कूल में पढ़ने जाते थे। डॉ आंबेडकर के पैदा होने से पहले शूद्रों को पढ़ने का अधिकार धन रखने का अधिकार स्कूल खोलने का अधिकार इन मिशनरियों के द्वारा मिल गया था जिसे देखकर ब्राह्मण समाज के लोग शुरू से ही ईसाइयों से नफरत करते आ रहे हैं इसीलिए थोड़ा डॉक्टर अंबेडकर के बारे में भी जान ले कोलंबिया विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के दौरान एक विधवा यहूदी महिला ने डॉक्टर अंबेडकर की काफी सहायता की जिसका नाम फनी क्रिस्टीयल था जो हाउस ऑफ कामन्स में काम करती थी, कोलंबिया विश्वविद्यालय में रॉबर्ट जे.मोफ्ल्ल डॉक्टर अंबेडकर के घनिष्ठ मित्र थे इन्होंने भी डॉक्टर अंबेडकर की काफी सहायता की थी, आईए जेकेएल एक यहूदी पत्रकार था जिसने डॉक्टर अंबेडकर और उनके आंदोलन को आगे बढ़ाने में काफी योगदान दिया यही सारे कारण है जो लोग आज ईसाइयों से इतना नफरत करते हैं भारत देश में आज हर एक व्यक्ति अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है इंग्लिश मीडियम स्कूल की शुरुआत भारत में ईसाइयों के द्वारा हुई अगर देखा जाए तो बहुजन समाज के ऊपर ईसाइयों का बहुत बड़ा योगदान है इसी योगदान के कारण हिंदू समाज के लोग शुरू से ही ईसाइयों के विरोध में है जबकि अपने बच्चों को ईसाईयों के विश्वविद्यालय और स्कूल में पढ़ाते हैं लेकिन गरीब बहुजन समाज के लोगों को चर्च जाने से रोकते हैं ताकि वह ईसाइयों के द्वारा ज्योतिबा राव फुले और डॉक्टर अंबेडकर ना बन सके । इसके अलावा आज जितने भी टेक्नोलॉजी आज हम इस्तेमाल करते हैं जैसे फोन को बनाने वाले मार्टिन कूपर एक यहूदी थे, टेलीविजन के आविष्कारक जॉन लॉगी बेयर्ड एक मसीही थे दुनिया में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा अंग्रेजी की शुरुआत ईसाइयों के द्वारा हुई है इसलिए जो बहुजन समाज के लोग आज ईसाइयों का विरोध करते हैं वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं । लेखक. अरविंद कुमार

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