एक सच्ची घटना
2008 में मेरे बड़े भाई की शादी थी। घर में बड़ी खुशहाली थी, भाई होने के कारण मैं बहुत खुश था, क्योंकि उस दिन मुझे भी नया कपड़ा पहनाया जाता और मैं भी बारात में जाता। मेरे घर के सामने पांच बांस थे और उस पर सरपत के छप्पर बने थे जिसे हमारे गांव में माड़व कहा जाता है। क्योंकि हिंदू धर्म में शादियों में माड़व बनाना शुभ और अनिवार्य है। बीच वाले बांस के बगल में एक सजाई हुई सुंदर हाड़ी रखी थी, शादी का दिन आ गया परिवार में खुशी का माहौल था। बड़े भाई को नहलाकर नए कपड़े पहनाए गए और पूजा-पाठ कराकर बाजा भी बजाया जा रहा था। कपड़े पहनाने के बाद बड़े भाई को नीम का पेड़, पीपल का पेड़ और घर पर रखे हुए देवता की पूजा करा कर शादी को रवाना कर दिया गया। बारात दूसरे गांव पहुंच गई नाचना गाना शुरू हो गया और उसके बाद खाना खाने का समय आया, सब लोग खाना खाने जा रहे थे। उसी समय मेरे पापा की कुछ बहुत पुराने मित्र आए जिस मित्रता को पापा ने कई सालों तक निभाया था। उन मित्रों ने पापा के पास आकर पैसा मांगने लगे और कहने लगे मुझे बाहर जाकर खाना खाना है, पापा ने कहा खाना यहां भी बना है मित्रों ने कहा हम यहां नहीं खा सकते हैं, यह कहकर वे बाहर बाजार में खाना खाने चले गए। पापा को बड़ा दुख हुआ कि जिस दोस्ती को कई सालों तक चलाया था वह मित्र आज खाना नहीं खा रहे हैं। लेकिन पापा कर भी क्या सकते हैं क्योंकि उनके मित्र ऊंची जाति के थे, और हिंदू धर्म में रिवाज है कि कोई भी बड़ी जाति के लोग छोटी जाति के यहां खाना नहीं खा सकते हैं भले ही दोनों हिंदू हैं तो क्या जो दोनों जाती जो एक दूसरे के यहां खाना भी नहीं खा सकते हैं तो क्या उन दोनों का धर्म एक हो सकता है, कदापि नहीं। और यदि एक ऊंची जाति के पास 100 बीघा खेत है और वह एक हिंदू दलित को 1 साल के लिए फ्री में नहीं दे सकते कि ले जाओ अपने लिए फसल उगाओ तो दोनों हिंदू कैसे हो सकते हैं। लेकिन ऐसा क्या है जो दलित अपनी बेटी की शादी ऊंची जाति वालों के साथ नहीं कर सकता और ऊंची जाति वालों के साथ नहीं खा सकता लेकिन फिर भी वह अपने आप को हिंदू क्यों कहता है, जबकि उसे हिंदू धर्म में उसे कोई सम्मान नहीं है। ऐसी ही कहानी डॉक्टर अंबेडकर की है उन्होंने इतनी पढ़ाई किया और 1924 में मुंबई के उच्च न्यायालय में लौट आए लेकिन दुख की बात यह है कि उनकी योग्यता तथा प्रसिद्धि ने हिंदू समाज में उन्हें सम्मान नहीं दिया इसलिए अंत में 1935 में उन्होंने एक क्रांतिकारी घोषणा की मैंने एक हिंदू के रूप में जन्म लिया मेरे पास कोई विकल्प नहीं था मैं हिंदू रहकर नहीं मरूंगा क्योंकि मेरे पास विकल्प है या कोई आवेगशील फैसला नहीं था। डॉ. अंबेडकर ने गहराई से धर्म परिवर्तन पर विचार किया,और 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ. अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन किया और लोगों को हिंदू धर्म परिवर्तन के लिए कहा क्योंकि उन्होंने जाना कि दलितों का पिछड़ापन का सबसे बड़ा कारण हिंदू धर्म है, इसलिए जब आदमी हिंदू रहेगा ही नहीं तो पिछड़ेगा क्यों दूसरी बात जब आदमी अपने मन से धर्म परिवर्तन करता है तब इससे पता चलता है कि वह आदमी स्वतंत्र है, वह किसी का गुलाम नही है। तीसरी बात जब आदमी सत्य को जानता है तब धर्म परिवर्तन करता है बाईबल यूहन्ना 8:32 कहता है कि तुम सबको जानोगे और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा, इसलिए जब तक उस आदमी के पास आजादी नहीं तब तक उस आदमी के पास सही ज्ञान नहीं है यीशु मसीह ने कहा जीवन सत्य मार्ग में ही हूं बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता,पिता वह है जो पूरे संसार से प्रेम किया और अपने पुत्र को इस संसार के लिए दे दिया ताकि उस पर विश्वास करें वरना आशना हो परंतु अनंत जीवन पाए इसीलिए जो आदमी आपको धर्म परिवर्तन से रोकता है वह आपको आजाद होना नहीं देना चाहता है इसलिए सत्य को जाने और धर्म परिवर्तन करें। अधिक जानकारी के लिए इन पुस्तकों को पढ़ें। 1.तृतीय रत्न (ज्योतिबा राव फुले) 2.धर्मांतरण स्वतंत्रता सम्मान व सामाजिक क्रांति का मात्र एक मार्ग (डॉ.विशाल मंगल वादी)
Very good
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